गुजरात के एक गाँव की घटना है | उन दिनों एक सन्यासी जगह जगह घूम रहे थे और जनता जनार्दन को धार्मिक होने का वचन भी दे रहे थे | इसी क्रम में गुजरात के एक प्रत्यन्त कस्बे में उनका ठहरना हुआ | उन्होंने काफ़ी लोगों से संवाद करते हुए अपने भोजन आदि का इंतज़ाम कराने से चूके | कई श्रीमंत लोगों का आना जाना तो हुआ ; बड़ी बड़ी बातें भी हुई | पर उनमे से किसी को इस बात का भान ही नहीं रहा की संत श्री के भोजन आदि का इंतज़ाम किसके तरफ है ! पाठशाला का एक कमरा उनके ठहरने के लिए खुला रखा गया |
दिए के प्रकाश में जिसका चेहरा प्रकाशमान हो रहा था वो एक हरिजन किसान था, जो उस महात्मा से कुछ कहने के लिए इंतजार कर रहा था | बड़े बुजुर्गों की भीड़ में सामने आकर कुछ कह पाने से भी कतरा रहा था | ज़्यादा देर होने के बाद संत श्री ही पूछे, "तुम्हें क्या तकलीफ़ है? सब तो चले गये !"
"वही तो सोच रहा हूँ! सब तो चले गये, अब आपके भोजन का क्या होगा? मैं ठहरा हरिजन, उबला हुआ खाना आपको लाकर दे भी नहीं सकता ! पर एक काम तो ज़रूर कर सकता हूँ ; कुछ कच्चा लाकर देता हूँ, आप उबालकर खा लें !"
सहमी हुई धुन में किसान बोलने लगा |
एक बात सोचकर संत श्री काफ़ी देर तक चुप् रहे | उन्हें अब तक इस बात का अभिमान हो चला था कि वो खुद ही सबसे ज़्यादा धार्मिक हैं और बाकी सबका ज्ञान अधूरा है, पर इस किसान की बातें सुनने के बाद अब लग रहा है कि उनसे भी ज़्यादा धार्मिक तो यह किसान है जिसे इस बात की चिंता सता रही है कि उनका संतान क्या खाएगा ! समाज की एक प्रवाद ही है जो उसे ऐसा करने से रोके रखा |
"तुम पकाकर दो तो ज़रूर खा सकूँगा, नहीं तो निर्जाला ही रहने दो |" संत भी कभी कभी लोगों को द्विविधा में डाल देते हैं | अब श्रीमंत लोगों की टोली पार करके ग़रीब किसान अपनी कुटिया से खाना लाने के काम में लग गया |
ऐसी खबर छिपाए भी कहाँ छिपे ! लोगों को पता चला तो शर्म के मारे सब पानी पानी हो रहे थे | उस किसान को तो मानो स्वर्ग सुख ही मिल गया !
. भेद बुद्धि की गुलामी करनेवालों को मौके मिल ही जाते हैं | संतों की वाणी में खोट निकालते निकालते सोने का सिक्का भी मिट्टी जैसा बन जाता है | उमा का शरीर लेकर महादेव इतने इतने जगहों पर कैसे गये होंगे ! वो तो रहने ही दें, विष्णु अपने चक्र के सहारे सती के पार्थिव शरीर को टुकड़ों में कैसे बाँटा होगा ! इस प्रकार की द्विविधा भी हमारे मन में धर्म और विज्ञान के द्वंद के कारण ही उत्पन्न होता है | विष्णु का अधिष्ठान यदि प्रत्येक कणों में है तो कणों के चक्र को ही विष्णु का चक्र मान लेना होगा | इस मान्यता के बाद तो विष्णु के लिए किसी भी पार्थिव शरीर को खंडित कर देना सदैव संभव हो ही सकेगा |
अपने भारतीय दर्शन की यह ख़ासियत ही है कि तर्क की कोई प्रतिष्ठा नहीं मानी जाती; यहाँ विश्वास के स्तंभों पर ही धर्माचरण का टीला बैठता है | जब की परिस्थितियों में घटनाएँ घटित हुई होंगी तब हम सब नहीं थे | जिन संतों ने उस घटना को लिपीबद्ध किया उन्हें भी लोगों को कुछ धर्माचरण का पाठ देना था ; वे अपने विवरणों में शैक्षिक मूल्यों को पिरोते चले गये |
सृष्टि रचना का रहस्य ज़्यादा कुशलता पूर्वक समझाने का काम स्वयं कपिल मुनि ने किया | उनके सांख्य सूत्र में वर्णित पुरुष और प्रकृति तत्व के सम्मेलन से सृष्टि को मूर्त होता हुआ देख सकेंगे | यह विषय भी काफ़ी सरलता से रखा गया; पुरुष को उर्जा का प्रतीक और प्रकृति को पदार्थ के कणों का प्रतीक मान लेने से सृष्टि रचना का पूरा रहस्य ही हम सरलता और सुगमता के साथ समझ सकेंगे |
कहते हैं गीता का उपदेश भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को सुना रहे थे | असल में अर्जुन तो एक बहाना था , सत्संग का लाभ श्री हनुमान जी को देना था जो कपीध्वज के रूप में युद्ध भूमि में विराजमान थे| जो अमोघ वाण से अर्जुन को भी बचाने वाले थे | यह तो श्री कृष्ण को भी पता था कि अर्जुन को कर्ण के अमोघ वाण से बचाने की क्षमता तो स्वयं उनमें भी नहीं है |
असल में बात कुछ ऐसी है कि अर्जुन को अपने श्रेष्ठ धनुर्धर होने का घमंड हो चुका था | वो समुद्र पर पत्थर का पुल बनाने के औचित्य के विषय को लेकर श्री हनुमान जी से उलझ गये | उन्हें यह भी साबित करना था कि पत्थर के पुल से कहीं ज़्यादा कारगर है तीर से बना पुल | शर्त इस बात की लगी कि उस पुल को कारगर साबित करने से अगर अर्जुन चूके तो उन्हें आत्मदाह कर लेना मंजूर होगा | और यदि उनकी जीत हुई तो श्री हनुमानजी अर्जुन के कहे अनुसार काम करेंगे | तीर के बने पुल के ऊपर से हनुमान जी को ही पार होना था | पार होना तो दूर की रही, पैर डालते ही पुल टूट गया |
अर्जुन चिता लगाकर आत्मदाह के निमित्त से बैठ गये , "मुझे अब जीने का कोई हक नहीं है |"
श्री कृष्ण आकर अर्जुन को यह कहकर रोके कि उन दोनों के शर्त लगने के समय कोई तीसरा भी रहना चाहिए, जिसे शर्तों के उचित अनुचित का ज्ञान हो!
फिर से पुल बनाकर उसके ऊपर से दोबारा श्री बजरंगबलि को जाने के लिए कहा गया | इस बार तो हनुमानजी के भार से पुल टूटते टूटते रहा, पर समुद्र का पानी ही लाल हो उठा | बीच में से पुल को सहारा देनेवाले बंशीधारी ही ज़ख्मी हो गये थे |
"मुझे माफ़ कर दें प्रभु, मैंने आपको पहचान लिया !" मारुति की भक्ति और ज्ञान के
सम्मेलन का चमत्कार ही था जो कि भगवान को भी परेशानी में डाल रहा था | अपनी हार मानकर मारुति शांत होकर बैठ गये | अंततः यह तय हुआ कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में उन्हें पांडवों का पक्ष लेकर रहना होगा | वो न तो हथियार उठाएँगे और न ही युद्ध करेंगे : फिर भला युद्ध में उनके रहने से क्या हासिल होगा ! असल में एक भक्त को भगवान का सान्निध्य प्राप्त होगा और उसी पुण्य के बदौलत अर्जुन का कपीध्वज रण भूमि में सक्रिय रहेगा |
हनुमान जी को दिए वचन अनुसार ही श्री कृष्ण भगवान युद्ध भूमि के बीच में ही सत्संग करने लगे |
कुछ संत स्वाभाव ऐसे भी हैं जो कभी किसी से कुछ माँगना पसंद नहीं
करते । उन्हें लगता है कि समाज को अगर लगने लगे कि संत को जीवित रखना है तो ज़रूर
इसकी व्यवस्था हो ही जाएगी । अक्सर संतों के जीवन में ऐसे पड़ाव आते रहते हैं जहाँ
उन्हें कठिनाइयों से गुजरने की नौबत आ जाएँ
। शुद्ध व्यक्तित्व के धनी संतों को किसी भी परिस्थिति में विचारों और
नियमों से समझौता करना मंजूर नहीं होता है । उप्याचना का व्रत लेकर निकल पड़ने
वालों में संत विनोबा भी थे । अगर ऐसी ही बात है तो फिर उन्हें ज़मीन माँगने की
बात कैसे सूझी ? क्या उनका फिर उपयाचना का व्रत भंग हो गया ? ऐसा बिल्कुल भी नहीं
है ; इस प्रकार की याचना में जनता जनार्दन का कल्याण निहित होने के कारण उनका संत
स्वभाव उस परम पुरुष सत्ता का काम किया जिसे व्यावस्था में प्रवेश न करते हुए
सृष्टि की आकांक्षा सहित व्यवस्था को किसी
चरम उत्कर्ष के लिए प्रभावित और क्रियाशील करना था । जहाँ ज़मीन को लेकर के ही दुनिया
भर के झगड़े होते हों वहाँ भूमि दान का यज्ञ संपन्न कर पाना अपने आप में ही एक
विरल उपलब्धि है । उनके लिए प्रत्येक दान ही पवित्र और पावन था ; चाहे वो एक
टुकड़े का ही दान क्यों न हो । जिनके पास जमा धन है उनके लिए दान एक मजबूरी सी
हो जाती है, पर जिन्होंने श्रमानुभव से
कुछ बचत किए होंगे उनके लिए दान एक पवित्र यज्ञ से कम नहीं ।
