गीता ज्ञान

 


कहते हैं जबतक लघु रहेगा तबतक गुरु की जरुरत पड़ेगी; जहां लघु समाप्त हो गया , ज्ञान की परिपक्वता पा ली गई वहां गुरु का प्रयोजन भी समाप्त हुआ; पर उस पड़ाव तक आते आते कभी कभी भक्त के भौतिक जीवन का अंतिम पड़ाव ही आ जाता है ; भक्त अपना शरीर खो बैठता होगा; मुक्ति का स्वाद लेने के लिए आगे बढ़ता होगा और अगर लालसा बानी रही तो फिर से भौतिक जगत की और रुख करता होगा।

वो अजनबी इंसान फिरसे बोला, “आपसे मिलकर मुझे अच्छा लग रहा है; मैंने घर छोड़कर ठीक ही किया हूँ?", यह कह पाना मेरे लिए काफी कठिन था कि उसने घर छोड़कर ठीक भी किया होगा या नहीं! उसके बारे में और जानकारी पाने के बाद मुझे लगा उसका अभी घर छोड़ना शायद समस्या से भागने जैसा हुआ; बेटी की  जिंदगी का अहम् पड़ाव, बेटे को होनहार बनाना, माताजी को गंगा यात्रा कराना ऐसे कई काम हैं जिसकी प्रत्यक्ष जिम्मेदारी उस अजनबी इंसान पर डल चुकी थी।  अब उसका हौसला बढ़ाने के लिए फिर कहा गया कि उसे किसी और व्यवसाय के बारे में प्रयास करना चाहिए, प्रयास करते करते रास्ते मिल ही जाएंगे; समस्या छोड़कर भागने से सभी समस्याओं से पीछा नहीं छूटनेवाला।  लोगों का विशवास भी हासिल करना कठिन ही होगा। 

एक और पड़ाव पर उसे कुछ नकारात्मक उत्तर ही मिला; वहां दाखिल होने के लिए और गेरुवा धारण करने के लिए नौजवान होना होगा, ब्रह्मचारी होना होगा; देश दुनिया से अलग होगर देश दुनिया का काम करना होगा।  कहना तो बड़ा आसान ही समझें पर शायद ही कोई ठीक से कर पाते हों ! यह तो स्पष्ट नहीं हो रहा था कि कुल कितने ठिकानों से उसे न में उत्तर मिला होगा, पर मायूसी का परिमाण इस बात कि गवाही जरूर दे रही थी कि कहीं से उसे सकारात्मक उत्तर नहीं मिल पाया।  एक और पता है: क्रिया योगियों का पंडाल; वहां तो घर गृहस्थी देखते हुए तपस्या करने की बात की जाती रही: योगी बाबाजी महाराज  के अनुगामियों और उपासकों का ऐसा ही कुछ पहल भी काफी दिनों से चलता भी आ रहा होगा।  उस आगंतुक को उस क्रियायोग और उस योग में लगे समूहों के बारे में जानकारी दी गई।  किसी अनजान ठिकानों तक पहुँचने की आशा लिए गंगाजी के घाट पर पड़े रहने से कोई समाधान की उम्मीद ही नहीं लगाई जा सकती।  ईश्वर भी उसी की सहायता किया करता होगा जो सबल और सक्षम है।   अगर हुनर और कौशल की भी बात करें तो हर व्यक्ति कुछ कुछ मामलों में होनहार भी माना जाएगा और कुछ गतिविधियों के लिए कुशल और सक्षम भी माना जाएगा।  फिर कमजोरी व्यक्ति मात्र में रहना एक भवितव्य ही मानें; अर्जुन भी रणभूमि में गांडीव फेंककर रथ पर जा बैठे थे ; उन्हें भी सम्यक ज्ञान के होने और उस कौशल को उपयोग में लाने का पाठ अपने सारथी से सीखना पड़ा।  शंका निरसन के लिए यह भी जरूरी नहीं कि व्यक्ति इधर उधर भटके , बल्कि वक्त की नजाकत को समझते हुए अपनी भूमिका गढ़ेऔर समाज में कार्यरत रहे।  योगिराज अपना शरीर छोड़कर सागर पार किसी देश में कैसे चले जाया करते थे यह विषय कभी भी तर्क का और बहस का नहीं बन सकता; मन की तरंगें और भावनाएं तो कहीं भी जाया कराती है; अगर चाहें तो ब्रम्हांड के अंतिम छोड़तक भी इसे ले जाया जा सकेगा।  भौतिकवाद के पश्चिम के चश्मे से परिस्थिति को देखना कभी भी वेदान्तियों की पहचान नहीं बन सकती।  कभी कभी पश्चिम के लोग रमण महर्षि से भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ लिया करते थे।  सवाल पूछने और शंका निरसन करने के क्रम में भी पता चल ही जाता होगा कि अपने ह्रदय और दिमाग पर दृश्य जगत का कितना प्रभाव रहता होगा। 

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