वास्तविकता और कल्पना

जिस व्यक्ति को सनातनी परंपरा का रीति रिवाज विषयक सम्यक ज्ञान नहीं रहा होगा उसे तो यह काम बड़ा अजीब ही लगेगा, और मूर्खता भी समझी जायेगी।  किसी संत को भी अजीब ही लगा था जब उनहोंने देखा कि तर्पण  के समय पूर्वजों को जल देने के लिए अंजलि नदी और जलाशय में डाली जा रही थी; वो भी बड़े ही श्रद्धा के साथ और काफी नियमों का पालन करते हुए। 

इस शीर्षक के जरिये कुछ ऐसे ही विषयों पर चर्चा सत्र चलाई जा रही है जिसके आस पास विचार और परंपरा विषयक चर्चा और अध्ययन को गति मिल सकेगी। अभ्यासियों के सम्मुख एक नया आयाम भी खुल सकेगा।  सिर्फ इतना ही नहीं हम उन सभी क्रियाओं के जरिये स्व- के अध्ययन विषयक कृति को भी संदर्भित कर सकेंगे।  योग दर्शन में स्वाध्याय को नियम के अंतर्गत एक व्रत माना गया।  वहां चित्त के विक्षेप विषयक अनुक्रिया पर अंकुश पाने के लिए इस व्रत कि अहमियत गिनाई गई है। अगर वेद का आधार मानें तो पाते हैं कि पवित्र ग्रंथों का अध्ययन ही स्वाध्याय है।

अप्रत्यक्ष रूप से यही अविद्या माया है, जिसके आवेश में आकर साधक महात्मा भी कभी कभी भ्रमित हो जाते और ईश्वर के जरिये भगवान के वितरित होते रहने के रहस्य को भली भाँति नहीं जान पाते। पुरुष का कर्म ज्ञान कृत होने के कारण प्रकृति के जरिये अभिव्यक्त होते समय एक स्वच्छंदत और निरलस भाव को बनाये रखते हैं और उसी निर्मलता से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय संकुल के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए मन, स्मृति और बुद्धि को कर्म में प्रवृत्त करते रहते हैं; वहीँ से कर्तव्य निर्धारण में भी उनकी ही एकमेव भूमिका बनती है; सृष्टि चक्र में व्याप्प्त इस निम्नवर्ती अभिव्यक्ति के चक्र से उन्नत होने के निमित्त से साधना में भी लगने के लिए उद्योगी होते हैं; साधना के मार्ग का चयन बुद्धि और कौशल्य के आधार पर कर लिया करते हैं; एक उन्नत पैमाने पर अन्य जीव के लिए प्रेरणा का श्रोत भी बन जाते हैं।  जड़ शरीर में प्राण संचार के बाद ही विधायक पुरुष का कर्म में प्रवृत्त होना ही एक सहजात नियति है, जिसके अधीन जीव को जन्म और मृत्यु के बीच फैले संचार पथ से होकर कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त होते हुए ही अग्रसर होना होगा; उन्नत जीवनशैली के लिए प्रत्नशील होना होगा; दिव्य ज्ञान से खुद को पुष्ट करना होगा; विवर्तन की धारा में चलते हुए देवत्व के आसान को अलंकृत करने के लिए दिव्य कर्म का अनुष्ठान भी करना होगा; उस मार्ग में आनेवाली बाधाओं को झेलना होगा; परम पुरुष के परम सत्ता को समझते हुए वैसी ही पूर्णता पाने के लिए भी अनुरक्त होना होगा। 

जगदीश्वर होते ही हैं सर्व कल्याण कारण ; सर्व नीति नियंता और सर्वभूते निहित आत्मा। उन्हें अनुभव करने का और आत्मा के साथ एकरूपता की स्थिति में महसूस कर पाने का ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म को माना गया।  एक बार ब्रह्मा निर्वाण की अवस्था पाने के बाद व्यक्ति कभी भी मोह के वशीभूत नहीं होता । अनावश्यक रूप से कर्म बंधन में जकड़े जाने से माया से व्याप्त दृश्य जगत के रंग बिरंगे व्यवधान आदि में  मन को न लगाते हुए उस परमेश्वर के अंशमात्र को खुद के चेतन स्वरूप में टटोलना होगा; वहां से मिलनेवाले दिव्य निर्देश को मान्य करते हुए अनन्य भाव से उसी ईष्ट की आराधना में भी लगाना होगा। भगवद्प्राप्ति के बाद भक्त में कुछ विशेष परिवर्तन आना अवश्यम्भावी है: परा भक्ति के द्वारा ईश्वर को (परम ब्रम्ह स्वरुप को) वह तत्त्वत: जानता है कि मैं वह परमेश्वर कितना व्यापक और कितना फैला हुआ है; तथा ईष्ट  क्या है।[1] इस प्रकार तत्त्वत: जानने के बाद वैसा तत्ववेत्ता भक्त भगवत स्वरुप ही बन जाता है। ईश्वर का अधिष्ठान कुछ गिने चुने अवयवों तक रहे और अन्य सब विश्व चराचर जगत सिर्फ मायालोक तक ही सीमित रहे ऐसा भी नहीं;[2] रचनाधर्मिता के आवेश में ईश्वर, या फिर सूक्ष्म स्टार पर  क्रियाशील एक ईश्वर स्वरुप  सत्ता, के जरिये किये जानेवाले पहल के बिना समग्र सृष्टि को अभिव्यक्त और प्रस्फुट होता हुआ भी हम शायद ही देख पाते।  समग्र सृष्टि को उसके विविध स्वरुप में देख पाने के लिए और उसी सृष्टि में अंश रूप से जुड़े रहने के लिए, अभियक्त होने के लिए हमें भी उसी दिव्य स्वरुप पर निर्भर रहने की जरुरत है; हम इसी कारण से उस परम सत्ता की अनदेखी भी नहीं कर सकते और ही उसकी अवहेलना करते हुए अग्रज की भूमिका में खुद को ढलते हुए अनुभव ही कर सकते। हर जीव में, सृष्टि के कणमात्र में उनके अधिष्ठान विषयक सत्य को कई प्रकार से शास्त्र और भाष्य कथन के जरिये इसे उजागर भी किया गया।

ब्रह्मनिर्वाण के कथन में भी उसी शुद्ध सरूप परमात्मा (परम पुरुष, ईश्वर) के अधिष्ठान विषयक अनुभव कहे जाते आये;  इसी क्रम में विदेह मुक्ति की बात भी आई। अगर माया के संसार से किसी को जीवन रहते रहते मुक्ति मिले तो फिर उस परिस्थिति के बारे में हमें कैसे अनुभव मिले; या उसकी (मुक्तात्मा की ) पहचान कैसे की जा सकेगी? क्या कोई ख़ास अनुक्रिया के जरिये उस विकास को समझना संभावर हो पायेगा भी? या फिर इस प्रकार के विकासोन्मुख जीवन को महज एक कल्पना मात्र ही समझें? [3] ; इसे अंतिम श्वास में पाने के अधिकारी भी ब्रह्मधाम ही पाएंगे। [4] पापमुक्ति का विषय भी कुछ ऐसा ही माना गया।  संदेह नष्ट हो जाने की स्थिति में, जीवों के कल्याण में तल्लीन होने की स्थिति में, ब्रह्म स्वरुप में आरूढ़ होने की स्थिति में भी योगी (ऋषि ) पापों से मुक्त होने का अधिकारी बनेंगे।  [5]

जिस योग में कर्म, ज्ञान और भक्ति की एकरूपता की बात कही जाती हो; जिसके अधीन आत्मा और परमात्मा को एकरूप हटे हुए, द्रष्टा और दृश्य जगत को परस्पर में विलीन होते हुए देखा जाना संभव माना गया; जिसके अधीन हर जीव में विराजने वाले आत्म स्वरुप परमात्मा ही कृत कर्मों के और साधना के साक्षी बनाते रहे ; उस योग को अनादि, अनंत काल से चला आता हुआ एक सनातन नियमन बताते हुए योगेश्वर बार बार उसी एकेश्वर और ब्रह्म स्वरुप परम निर्णायक और विधायक तत्व को प्रतिष्ठित करते रहे। 

अतः गीता में वर्णित योग को अलग से कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग, पुरुषोत्तम योग आदि से विशेषित करते हुए इसे एक सर्वसमावेशक तत्व के रूप में (ख़ास टूर से आत्म तत्व और ब्रह्म तत्व के रूप में) समझना होगा जिसके अधिकारी जीवन ईष्ट में स्वरूपस्थ होने के निमित्त से पवित्र जीवन के लिए, विधायक कर्म का सम्प्पादन करने के लिए, दृश्य जगत के माया स्वरुप से छूटकर परम सत्ता को जीव मात्र में पिण्डस्थ होता हुआ प्रत्यक्ष करने के लिए प्रवृत्त होते रहेंगे; पहले भी होते रहे और कई बार उस परम तत्व के अधिष्ठान विषयक परम ज्ञान का अधिकारी बनाते हुए पुरुषोत्तम स्वरुप से अवतरित भी हुए; अन्य साधकों के लिए प्रेरणा का श्रोत भी बने। गीता में विभूति का वर्णन करते करते भगवान खुद को भी एक योगी, परम सत्ता में स्वरूपस्थ बताते गए; एक योद्धा से भी कर्म समादन के जरिये, कर्मफल को ईष्ट को अर्पित करने के जरिये; सभी दुःख- आनंद, प्रमाद, लोभ, लालसा आदि का परित्याग कर देने के जरिये उस परम स्वरुप में सवरूपस्थ होने की भी रेरना देते गए; सिर्फ ऐसा करने के लिए कर्तव्य कर्म हो जाने के लिए भी मन कर गए।  किसी भी प्रकार के विधायक कर्म, यज्ञार्थ कर्म और कर्तव्य कर्म से विमुख  होकर  योगी , सन्यासी आदि बन जाने की भी प्रेरणा गीता नहीं देती।

ज्ञान-रहित कर्म के लिए व्यक्ति सहज ही रवितत भी हो जाता होगा और ऐसे कर्म से कुछ प्राप्तियां भी सहज ही हो जाती होगी; पर परम गति पाने के लिए और दिव्य पथ पर चल पड़ने का अधिकार इन्होने केलिए तो जनांगनी दग्ध कर्म ही चाहिए; वह भी कर्मफल त्याग कर पाने लायक (कर्मफल को ईश्वर के प्रति उत्सर्ग कर पाने की अभिलाषा के साथ) अनुरक्त भाव से कर्म में प्रवृत्त होना होगा।  ऐसे सभी कर्म खुद के लिए होकर विश्व चराचर जगत में सबकेलिए ही हुआ करेगा।  जो ऐसा कर पाएंगे वो पुरुषोत्तम स्वरुप ही होंगे; न कि प्रमाद ग्रस्त कोई मानव, मोहान्ध कोई साधक, विलासिता के दलदल में जकड़ा कोई भोक्ता पुरुष, राज धर्म से पतित कोई राजा, कर्तव्य पथ से स्खलित कोई गृही, सम्यकत्व से छूटा कोई साधक या फिर विलास व्यसन में अंध कोई तपस्वी।

आत्मा में परमात्मा अधिष्ठान; या फिर अगर अन्य भाव से कहें तो योगात्मा या फिर ब्रह्मात्मा (जैसे कि महर्षि विश्वामित्र राप्त करने के निमित्त से साधना करते रहे और पा लिए);  योगियों में उत्तम बन जाने के निमित्त से योगेश्वर एक योद्धा को प्रबुद्ध करते रहे; उनके खुद के स्वरुप में स्वरूपस्थ होने के लिए भी प्रबुद्ध करते रहे; संसार वृक्ष के स्वरुप को (गीता के अध्याय १५ के सन्दर्भ में ) उन दिव्य गुणों का आश्रय लेते हुए जीवात्मा से परमात्मा के स्वरुप तक उन्नत होने के लिए भी प्रेरणा देते रहे। नाशवान तत्व में जकड़े अविनाशी परम तत्व को मुक्त होने का मार्ग समझाते रहे ।

अगर परम सत्ता के अंश को हर जीव में (यहां तक कि विश्व चराचर जगत के हर अंश में ) रहने की बात को सत्य माँ लें तो क्या कारण है कि उस परम तत्व के अधिष्ठान से विश्व चराचर के हर अवयव को सक्रीय होता हुआ हम देख नहीं पाते? हम उस परम पुरुष को देखते हुए भी उसकी अवज्ञा करने लग जाते और कभी कभी दम्भ और प्रमाद से आविष्ट हो जाते! ज्ञान के साथ भक्ति का सहावस्थान न हो पाने की स्थिति में शायद ऐसी परिस्थितीत और भ्रम का निर्माण हो जाता होगा; शायद साधक किसी मोह, माया या प्रमाद में आकर ऐसा कर पाते होंगे। [6]

विज्ञान की अवधारणा के साथ अवतार तत्व और परम पुरुष का दृश्य चराचर जगत में अदिष्ठान विषयक गहन सत्य को समझना कठिन भी होगा; तर्क से परे रख पाना भी दुःसाध्य ही होगा।  आधुनिक मन की मन की अवधारणा सिर्फ दृश्य जगत की पगडण्डी में ही कैद रहा करेगी और विषय वासना से ग्रसित हो जाने के कारण उनके लिए परमात्म स्वरूप की उपस्थिति को अनुभव कर पाना काफी दुष्कर भी होगा।  उन्हें शायद ही तर्क और वाक् वितंडा से बाहर निकालकर परम  स्वरुप तक ले जाने में किसी साधक महात्मा को सफलता मिलेगी। साधक की ध्यान, धारणा और समाधिस्थ स्वरुप को उस परम तत्व के प्रति अनुरक्त कर पाने में तभी सफलता मिल सकेगी जब हमें उस साधक में दिव्य गुणों के अधिष्ठान विषयक प्रमाण या फिर कोई स्वच्छंद स्वीकारोक्ति मिल सके। [7]  समय समय पर सिर्फ दिव्य गुणों और दिव्य कर्मों के लिए प्रवृत्त आत्मा का ही जन्म होता रहेगा ऐसा भी नहीं।  कभी कभी आसुरी वृत्ति का भी विकास हो ही जाता है; ऐसे कई मुहूर्त आये जब बुद्धि और हुनर का व्यवहार करके आसुरी वृत्ति का विकास फलप्रद होता चला गया और उस विकास पर अंकुश पाने के लिए जगदीश्वर को, रूद्र को और ब्रह्म स्वरुप को अवतरित होते हुए देखा गया। उस अवतरण में कारण स्वरुप किसी भी सत्ता को मानें पर अंततः उस आत्मा स्वरुप से पुष्ट प्राण को ही विपरीत गति से ग्रसित पाते हैं।  हम यह भी महसूस कर सकेंगे कि जिस भेद बुद्धि से और प्रमाद आदि से ग्रसित होकर कोई प्राण गात मार्ग का परिपन्थी होता होगा उसे भी परमात्मा में स्वरूपस्थ होने के लिए मौके मिल ही जाएंगे ; और परमात्मा अंततः उन्हें किसी विनाशलीला के माध्यम से स्वाकार करेंगे ,न कि संवर्धित करके; कुछ यही दशा लंका नरेश रावण की भी हुई जहां अवतार स्वरुप मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को हेतु माना जाएगा। [8]  सृष्टि रचना में योगमाया का ही इस्तेमाल ईश्वर किया करते हैं; उसी योगमाया के कारण हम दृश्य जगत में निहित परम सत्ता को प्रत्यक्ष रूपप से किसी इन्द्रियग्राह्य अवयव के रूप में नहीं देख पाते; और कभी कभी ईश्वर उसी योगमाया के कारण हमारे सम्मुख एक क्रियाशील माया रचना के रूप में रकत होकर हमें भी उस और प्रवृत्त हो जाने के लिए प्रबुद्ध करते रहते है। 

  तो क्या यह मान लें कि सिर्फ राक्षसराज रावण के संहार के लिए ही जगदीश्वर को और रूद्र अवतार श्री बजरंग बलि  को अवतरित होना पड़ा? क्या उन्हें सिर्फ इसी कार्य को सफल करने के लिए गुरुगृह में शिक्षा मिली? क्या सीता का हरण, मर्यादा पुरुषोत्तम का वनवास सब पूर्वकल्पित था ?

गोस्वामी तुलसीदास इस भ्रम को दूर करते हुए लिखते हैं, "राम जनम जग मंगल हेतु "; [9] इस आशय की पुष्टि के लिए कई व्याख्यान, विविध उद्धरण और उपाख्यान रचे गए; भाष्य लिखे गए; संतों के बीच चर्चा चली और भक्ति की शाश्वत धारा भी बही।  अतः उस अवतरण के विषय को किसी भी हालत में किसी संकुचित दायरे में रहकर नहीं देखा , या फिर महसूस किया, जा सकता। 

अतः अवतार के किसी ख़ास हेतु की पुष्टि के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, परम रतापी परशुराम आदि दिव्य पुरुषों को अवतरित होना पड़ा, इस कथन को भी एक संकुचित वर्ग विभाजन या फिर सम्प्रदाय विभाजन के दायरे में रहकर सत्यापित नहीं किया जा सकता। उनके अवतरित होने के कई हेतु हैं और प्रत्येक हेतु को सामान रूप से दिव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देने लायक शिक्षणीय माना गया। 

वेद, उपनिषद्, पुराण आदि में हमें समय समय पर चरित्र चित्रण मिल ही जायेगी; उन सभी चरित्र चित्रण के जरिये संत महात्मा यही चाहते थे कि अभ्यासी नागरिकों और साधकों को अपने चरित्र निर्माण के लिए एक उत्तम मार्ग मिल सके।  मर्यादा पुरुषोत्तम का गुणगान करने का दायित्व स्वयं रूद्र अवतार ने ही उठा लिया, भक्तों की क्या कहें ! यहाँ तक कि एक शत्रु पक्ष के विवरण में भी उस चरित्र बल विषयक गुणगान और उद्धरण मिल ही जायेगा: "तरुणौ रूप सम्पन्नौ, सुकुमारौ , महाबलौ ………..[2] "; इस विवरण में विपरीत गुणों का आश्रय एक ही चरित्र में देखा जा सकेगा: जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम सुकुमार होने के साथ साथ महाबलशाली हैं; युद्ध भूमि में डटकर लड़ने के साथ साथ करुणानिधान भी बने रहेंगे।  उनके जरिये ही भगवत्व का सफल निदर्शन भी पेश किया गया।  एक ही मानव चरित्र में विपरीत गुणों का आश्रय ही भगवत्व के अधिष्ठान होने का प्रमाण भी समझें।  हर प्रकार से अभिप्राय यही समझी जा सकेगी कि संत महात्मा उस दिव्य पुरुष के चत्रिर बल से ही सबको बालियान करना चाहते थे; आज भी संत महात्मा उसी कार्य में लगे हुए देखे जा सकेंगे।  प्रत्यक्ष रूप से हो या फिर परोक्ष रूप से उस चरित्र बल से हमें काफी कुछ शैक्षणिक तत्व मिल जायेगी; उसे धरोहर मानकर हम अपने अनुजों को भी वही शैक्षणिक तत्व देकर जाने का प्रयास भी करते ही रहेंगे; यह अपने संस्कृति का परिचायक भी समझें। पहले  पहल  तो एक ऐसी परिस्थिति बनती है जब हम खुद को किसी भी कृति का कर्ता मान लेते हैं और उसी भ्रम जीवन बिता देते हैं कि हमने कुछ किया; कुछ ऐसी कृति जिसका श्रेय हम चाहते हैं कि हमें मिले।  फिर एक ऐसा पड़ाव आता जब हमारी समझ बनती है कि सृष्टि और विनाश तो प्रकृति के नियमों के अधीन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और इसमें पदार्थ और ऊर्जा का आपसी मेल बंधन का विज्ञान क्रियाशील निकाय बना; यह भी एक भवितव्य ही है है कि हर जीव के जीवन में मृत्यु का अनुशाशन कभी भी सकता।  एक पड़ाव ऐसा भी आता है जब व्यक्ति जीवन को काफी मूल्यवान मानते हुए सभी अल्पावधि के सुखों को छोड़कर उस आनंदमय जीवन का पथिक बन जाना पसंद करेगा जिसपर चलकर आत्मा और अरमात्मा के रिश्तों को उनके सही स्वरुप में उपलब्धि किया जा सके और जीव के लिए सम्यक ज्ञान के आधार पर कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशांत किया जा सके।

 

 

[1] “ सिया राम माय सब जग जानी.” श्री रामचरित मानस।।  गोस्वामी तुलसीदास

 

[2] तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

फ़लमूल-अशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रम्हचारिणौ पुत्रौ दशरथस्य एतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥व शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् रक्षःकुल-निहन्तारौ त्रायेतां नः रघु-उत्तमौ ॥१९॥

 

 …….सुपर्णखा के जरिये श्री मर्यादा पुरुषोत्त्तम का परिचय दिया जा रहा था।।  श्री वाल्मीकि रामायण।।



[1] भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।गीता १८ .५५ ।।

सा इयं ज्ञाननिष्ठा आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिरिति उक्ता। तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतः अभिजानाति? यदनन्तरमेव ईश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिः अशेषतः निवर्तते। अतः ज्ञाननिष्ठालक्षणतया भक्त्या माम् अभिजानातीति वचनं विरुध्यते। अत्र सर्वं निवृत्तिविधायि शास्त्रं वेदान्तेतिहासपुराणस्मृतिलक्षणं न्यायप्रसिद्धम् अर्थवत् भवति -- विदित्वा৷৷৷৷ व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह0 0 351) तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः (ना0 0 279) न्यास एवात्यरेचयत् (ना0 0 278) इति। संन्यासः कर्मणां न्यासः वेदानिमं लोकममुं परित्यज्य (आप0 0 12313) त्यज धर्ममधर्मं ( महा0 शा0 32940) इत्यादि। इह प्रदर्शितानि वाक्यानि। तेषां वाक्यानाम् आनर्थक्यं युक्तम् अर्थवादत्वम् स्वप्रकरणस्थत्वात्? प्रत्यगात्माविक्रियस्वरूपनिष्ठत्वाच्च मोक्षस्य। हि पूर्वसमुद्रं जिगिमिषोः प्रातिलोम्येन प्रत्यक्समुद्रजिगमिषुणा समानमार्गत्वं संभवति।

 

 

[2] ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।१८ .६१ ।।

मानो किसी यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है; उसे प्रकाशमान रखता है;

शंकर भाष्य:  ईश्वरः ईशनशीलः नारायणः सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे हृदयदेशे अर्जुन शुक्लान्तरात्मस्वभावः विशुद्धान्तःकरणः -- अहश्च कृष्णमहरर्जुनं (. सं. 691) इति दर्शनात् -- तिष्ठति स्थितिं लभते। तेषु सः कथं तिष्ठतीति? आह -- भ्रामयन् भ्रमणं कारयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि यन्त्राणि आरूढानि अधिष्ठितानि इव -- इति इवशब्दः अत्र द्रष्टव्यः -- यथा दारुकृतपुरुषादीनि यन्त्रारूढानि। मायया च्छद्मना भ्रामयन् तिष्ठति इति संबन्धः।।

[3] 'योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथन्तर्ज्योतिरेव यः। योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽघिगत्वचति॥' –  'जो अपने भीतर रहने वाले परमात्मा के आनंद को अनुभव कर लेगा; उसी में स्थिरता पा लेगा ( विश्राम ) और उसी में  परमात्मा की प्राप्ति से प्रबुद्ध होता होगा , ऐसा ब्रह्मरूप योगी ब्रह्मधाम को पाने का अधिकारी बनेंगे (गीता .२४ )

 

[4] एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनं प्राप्य विमुह्यति; स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्राह्मणनिर्वाणमृच्छति।' -  (गीता .७२ )

भाष्य (श्री माधवाचार्य): निश्चितफलं ज्ञानं तस्य तावदेव चिरम् छां..6142़। यदु৷৷. नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति छां..4155 इत्यादिश्रुतिभ्यः कायव्यूहापेक्षा तद्यथेषीकातूलम् छां..5243 तद्यथा पुष्करपलाशे छां..4143ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि 437 इत्यादिवचनेभ्यः। प्रारब्धे त्वविरोधः प्रमाणाभावाच्च। तच्छास्त्रं प्रमाणम्।अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम्। मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः इति निन्दावचनात्।

यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव सत्यत्वम्। हि तेषामपीतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम्। तथाह्युक्तम्एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान्मोहयिप्यति। त्वं रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय। अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज। प्रकाशं कुरु चात्मानमप्रकाशं मां कुरु इति वाराहे।कुत्सितानि मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः। चकार शास्त्राणि विभुः ऋषयस्तत्प्रचोदिताः। दधीचाद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु। चक्रुर्वेदैश्च ब्राह्मणानि वैष्णवा विष्णुचोदिताः। पञ्चरात्रं भारतं मूलरामायणं तथा। तथा पुराणं भागवतं विष्णुर्वेद इतीरितः। अतः शैवपुराणानि योज्यान्यन्याविरोधतः इति नारदीये।

[5] लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षणिकल्मशाः।

छिन्नद्वैघा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः। – (गीता .२५ )

भाष्य (श्री माधवाचार्य): पापक्षयाच्चैतद्भवतीत्याह लभन्त इति। क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधा यतात्मानः। द्वेधा भावो द्वैधम् संशयो विपर्ययो वा। तच्चोक्तम् विपर्ययः संशयो वा यद्वैधं त्वकृतात्मनाम्। ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परिव्रजेत् इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः। तत एव छिन्नद्वैधाः। तच्चोक्तम् क्षीणपापा महाज्ञाना जायन्ते गतसंशयाः इति।छिन्नद्वैधा यतात्मानः इति वा।

[6] समस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।गीता .११ ।।

शंकर भाष्य : अवजानन्ति अवज्ञां परिभवं कुर्वन्ति मां मूढाः अविवेकिनः मानुषीं मनुष्यसंबन्धिनीं तनुं देहम् आश्रितम्? मनुष्यदेहेन व्यवहरन्तमित्येतत्? परं प्रकृष्टं भावं परमात्मतत्त्वम् आकाशकल्पम् आकाशादपि अन्तरतमम् अजानन्तो मम भूतमहेश्वरं सर्वभूतानां महान्तम् ईश्वरं स्वात्मानम्। ततश्च तस्य मम अवज्ञानभावनेन आहताः ते वराकाः।।कथम्;

[7] दिव्य गुणों के बारे में और उन गुणों के अधिष्ठान होपाने के बारे में श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय १६ में विस्तार से चर्चा की गई। 

[8] आसुरी वृत्ति विकसित होने के बारे में शंकर भाष्य : [गीता अध्याय , श्लोक १२ ]

मोघाशाः वृथा आशाः आशिषः येषां ते मोघाशाः? तथा मोघकर्माणः यानि अग्निहोत्रादीनि तैः अनुष्ठीयमानानि कर्माणि तानि ? तेषां भगवत्परिभवात्? स्वात्मभूतस्य अवज्ञानात्? मोघान्येव निष्फलानि कर्माणि भवन्तीति मोघकर्माणः। तथा मोघज्ञानाः मोघं निष्फलं ज्ञानं येषां ते मोघज्ञानाः? ज्ञानमपि तेषां निष्फलमेव स्यात्। विचेतसः विगतविवेकाश्च ते भवन्ति इत्यभिप्रायः। किञ्च -- ते भवन्ति राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावम् आसुरीम् असुराणां प्रकृतिं मोहिनीं मोहकरीं देहात्मवादिनीं श्रिताः आश्रिताः? छिन्द्धि? भिन्द्धि? पिब? खाद? परस्वमपहर? इत्येवं वदनशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्ति इत्यर्थः? असुर्या नाम ते लोकाः (0 0 3) इति श्रुतेः।।ये पुनः श्रद्दधानाः भगवद्भक्तिलक्षणे मोक्षमार्गे प्रवृत्ताः --,

[9] धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।

गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ राम सम जान जथारथु।।

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।

करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

…………… श्रीरामचरितमानस - २५४

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