स्वाध्याय

 


अपने  देश  में आदि काल से संतों का  उदय होता रहा है | यहाँ तक कि गृहस्थ जीवन में  से धर्माचरण के अभ्यासी अंततः सन्यास लेकर अपने जीवन को धन्य कर चुके | दिव्य जीवन के पावन पथ पर चल पड़ने वालों में श्री माधवदास जी का भी नाम आता है |

उनके जीवन से संबंधित कई घटना और चमत्कार लोगों को श्री जगन्नाथ की महिमा के बारे में सोचने के लिए मजबूर  कर देता है | विद्या के धनी श्री माधवदास कभी खुद को विद्वान नहीं मानते थे ; सरलता और सादगी का जीवन जीते थे | जब उन्होंने घर घर जाकर भीख माँगने का काम शुरू किया तो लोग काफ़ी  अपशब्द भी बोलते थे | एकबार एक गृहणी ने तो घर में पोछा लगाने वाला कपड़ा फेंककर उन्हें मारा ; वो बिल्कुल नाराज़ नहीं हुए | उन्होंने वो कपड़ा उठाकर साफ किया और मंगल कार्य में लगाना मुनासिब समझा | अपने ईष्ट देवता से भी यही प्रार्थना करने लगे कि उस गृहणी का दुःख दूर हो और जो आकांक्षा लिए उसने ईश्वर का भजन किया वो  पूर्ण हो | उस घर से वापस आते समय उन्होंने कहा  भी, "तूने मुझे पोता दिया तुझे भी पोता ही मिलेगा |"

कुछ दिनों के बाद उस घर में एक बालक का जन्म हुआ | घर के लोग माधवदासजी के बारे में पूछताछ करने लगे | जिस बुढ़िया ने संतश्री को पोता फेंककर मारा था उसे भी लगने लगा उनसे मिलकर माफी माँग लेनी चाहिए |

ऐसी ही एक और घटना उनके साथ बनारस के एक पंडित के शास्त्रार्थ को लेकर सुनने में आता है | एकबार शास्त्रार्थ करने आए उस पंडित को लगा कि श्री माधवदासजी को शास्त्रार्थ में हराने के बाद उन्हें ज़्यादा प्रतिष्ठा मिलेगी | और माधवदासजी के बारे में लोग यह भी कहते थे कि शास्त्रार्थ किए बिना ही श्री माधवदास हार मान लेते थे | उस पंडित को माधवदासजी के भक्तों ने ही शास्त्रार्थ में हरा दिया, और संतश्री से शास्त्रार्थ करने की नौबत ही नहीं आई |   मान्यता ऐसी भी है की ईष्ट चिंतन में रमे लोगों का भगवान सहाय होते हैं | हज़ारीबाग के पास बसे एक गाँव में जन्मे एक संत के बारे में भी कुछ ऐसी बात से हम अवगत हैं | वो बचपन से ही अंधत्व का शिकार हो गये; ऊपर से पिता- माता , यहाँ तक कि पालनहार बड़े भैया को भी खो दिए | उनका जीवन सिर्फ़ भाभी की करुणा पर टिका रहा ; कुछ करने की क्षमता भी नहीं रही | गाँव में एकबार भागवत कथा का पंडाल लगा तो अंधे बालक को मानो खजाना ही मिल गया ! वो दिनभर पंडाल में ही बिताने लगा; कथा सुनता और प्रसाद पाता | मायूसी तब छा गई जब कथा का आखरी पड़ाव आया | भक्त्वत्सल बालक ने व्यासपीठ को जाकर कहा , "महाराज, आपका जो भी काम हो मैं कर दिया करूँगा; सफाई कर दिया करूँगा; मुझे अपने साथ रख लें | जहाँ भी कथा चलेगी वहाँ मैं आपके साथ चलूँगा और कथा सुनूँगा |"

भगवत भक्ति से ओतप्रोत इस बालक को उस टोली में जगह तो नहीं मिली, पर अगले पड़ाव का पता ज़रूर मिल गया और व्यासपीठ के महाजन उस बालक को निमंत्रण भी दे दिए |

"भाभी मेरा खाना एक डब्बे में डाल दो, मुझे कथा सुनने जाना है |" .. यह रोज का सिलसिला बन गया | सबेरा होते ही बालक अपने तैयारी में लग जाता और गिने चुने साथियों के साथ भागवत कथा के पंडाल तक पहुँच जाता |

एक दिन सबेरे आसमान बादल से भर आया | उस दिन भाभी ने भी डब्बा तैयार नहीं किया और बालक को कथा में जाने से भी रोकने लगी | भागवत प्रेम का धनी भला कहाँ मानने वाला था!

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